परिचय
ज़्यादातर लोगों का अंदाजा है कि ब्रिटिश हुकूमत से पहले हिंदोस्तान के दलित शिक्षा से वंचित थे. लोग यह भी सोचते हैं कि प्राचीन भारत में शिक्षा सिर्फ उच्च जाति के लोगों तक ही सीमित थी. इस बात का खंडन कई बार हो चुका है. धर्मपाल ने हमें याद दिलाया कि ब्रिटिश आंकड़ों के अनुसार ब्रिटिश हुकूमत के पहले गाँव की पाठशालाओं में दलित विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही बहुसंख्या में मौजूद थे.
शुल्ब सूत्र सबसे प्राचीन ग्रंथों में एक है. ये शिल्पकारों की नियमावली है. शिल्पकार या मिस्त्री उच्च जाति के कभी नहीं थे, लेकिन वे तब शुल्ब सूत्र की भाषा संस्कृत पढ़ लिख सकते थे. वैसे भी यह सामान्य बुद्धि है कि जब तक बौद्ध धर्म और इस्लाम विकसित थे ज्यादती से बचने के लिए धर्मांतरण एक सरल उपाय था. इसलिए यह गंभीरता से दोबारा सोचना होगा कि ब्रिटिश हुकूमत ने जातीय भेदभाव को बढ़ाया (जिसमे कि उसका स्पष्ट फायदा था) या उसे कम किया.
संजय पासवान ने यह तर्क दिया है कि पुराने ज़मानें में दलितों के हालात इतने बुरे नहीं थे और समाज में उनका आदर था. वाल्मीकि और शबरी से ले कर संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, रविदास और कबीर सभी दलित थे. इसके विपरीत यह वितर्क है कि संत लोग ज़ात-पात के ऊपर होते हैं, “जात न पूछो साधू की”.
इसलिए धर्म से हटकर यह पूछना जरूरी है कि दलितों का विज्ञान या शास्त्र से संबंधित कुछ योगदान रहा या नहीं. था तो सही, लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है.
आधुनिक विज्ञान कैलकुलस (कलन) पर टिका है, क्योंकि भौतिकी के सभी खंड समीकरण (differential equations) कैलकुलस के सहारे ही लिखे जाते हैं. प्रचलित कहानी यह है कि कैलकुलस की खोज न्यूटन वग़ैरह ने की. सच्चाई यह है, की कैलकुलस की शुरुआत न्यूटन से हज़ार साल पहले पांचवी सदी में हिन्दुस्तान में पटना के आर्यभट ने की. इस बात का पर्याप्त सबूत मैं अपनी किताब "कल्चरल फ़ौंडेशंस ऑफ मैथमैटिक्स" में दे चूका हूँ. आर्यभट ने खंड समीकरण का संख्यात्मक हल कर खंड ज्या अथवा स्फुट "त्रिकोणमितीय" मान निकाले. यह सरल विधि आजकल “Euler's method” के गलत नाम से जानी जाती है. (याद रहे कि Euler ने हिन्दुस्तानी ग्रंथों का अध्ययन किया था और भारतीय पंचांग पर १७४० में लेख भी लिखा था. लेकिन तब इन्क्विसिशन के कारण यूरोपीय ज्ञान के गैर-क्रिस्तानी मूल को कभी स्वीकार नहीं करते थे.
आर्यभट के (अर्ध-) ज्या के मान कला (अंश का साठवां भाग, या पांच दशमलव स्थान) तक सही थे. इतनी सटीकता की क्या सामाजिक ज़रूरत थी? तब भारत में धन के दो मूल स्त्रोत खेती और विदेशी व्यापार थे. विदेशी व्यापार के लिए नाविक शास्त्र और खेती के लिए पंचांग (वर्षा ऋतु सही बताने के लिए) आवश्यक था. दोनों के लिए ग्रह गणित और खगोल शास्त्र जरूरी था, जिसके लिये सटीक "त्रिकोणमितीय" मान आवश्यक थे. आर्यभट के केरला के अनुयायियों नें इस विधि को बढ़ा कर "त्रिकोणमितीय" मान विकला (कला का साठवां भाग) और तत्परा (विकला का साठवां भाग) या नौ दशमलव स्थान) तक सही किया.
१६वीं सदी में विदेशी व्यापार से धन कमाना गरीब यूरोपियों का सबसे बड़ा सपना था. नाविक शास्त्र ही तब यूरोप की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चुनौती थी. और इसके लिए सटीक "त्रिकोणमितीय" मानों की सख्त ज़रूरत थी. इसलिए १६वीं सदी में जेसुइट कोची से कैलकुलस (और अन्य कई ग्रंथों का सामूहिक अनुवाद करा कर) यूरोप ले गए.
यूरोप में कैलकुलस का झूठा श्रेय न्यूटन को दिया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि न्यूटन और दूसरे यूरोपीय कैलकुलस और उसकी अनंत श्रेणी (infinite series) का योगफल निकालने की हिन्दोस्तानी विधि सही समझ तक न पाए. लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता के लोग कैलकुलस गहराई में नहीं सीखते. ज्ञान की जगह बचपन से न्यूटन के ख़ूब महिमागान सुनते हैं (और उन कहानियों की जाँच पड़ताल केवल विकिपीडिया और चैटबोट्स के सहारे करते हैं). अतैव इस प्रचार पर टिके उनके अज्ञानी अंदाज में विपरीत कहानी सच्ची हो ही नहीं सकती. अपने शोषकों में इस अन्धविश्वास के सहारे ही औपनिवेशिक शोषण आज तक बना रहा है, तो यूरोप और उसके फर्जी विज्ञान के इतिहास के बारे में यहाँ और बात करना फ़िज़ूल है.
आर्यभट दलित
आर्यभट के नाम से ही पता चलता है कि वह दलित था. भट का अर्थ गुलाम, नौकर आदि होता है. भट और भट्ट में फर्क करना बहुत जरूरी है, क्योंकि भट्ट विद्वान ब्राह्मण की पदवी होती है. अक्सर गलत तरीके से आर्यभट के नाम को आर्यभट्ट लिखा जाता है, जिससे उसकी जाति ही बदल जाती है. इसमें कोई शक नहीं कि आर्यभट ही सही नाम है. यही नाम सभी पांडुलिपियों में पाया जाता है. सातवीं सदी के गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का आर्यभट के अनुयायियों से मतभेद था, और वह अपेक्षाजनक तरीके उसे सिर्फ "भट" नाम से संबोधित करता है. आर्यभट पटना के पास कुसुमपुरा का निवासी था. (और जानकारी के लिए यह लेख देखें.
आर्यभट के हज़ार साल बाद भी, १६वीं सदी में, आर्यभट की आर्यभटीय इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि केरला निवासी नीलकंठ ने उस पर भाष्य लिखा. नीलकंठ सोमसूत्वन ब्राह्मणों में सबसे ऊंची जाति का नम्बूदिरी ब्राह्मण थे, जो अय्यर और अयंगार जैसे ब्राह्मणों से ऊंची श्रेणी के माने जाते हैं, आश्चर्य यह की तब केरला का नम्बूदिरी ब्राह्मण पटना के दलित का अनुयायी हो सकता था.
कैलकुलस के आविष्कार के अलावा आर्यभट ने विज्ञान भी किया. पृथ्वी के गोल आकार को समझाने के लिए कहा की पृथ्वी कदंब के फूल जैसी है. और पृथ्वी की त्रिज्या को भी सही नापा (सटीक त्रिकोणमितीय मान के सहारे). यह काम यूरोप में १७वीं सदी में हुआ. आर्यभट का यह भी मानना था कि तारे इसलिए घूमते नज़र आते हैं कि पृथ्वी विलोम दिशा में घूमती है. लेकिन वराहमिहीर और स्वयं आर्यभट के कई अनुयायी भी इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे.
मैंने आर्यभट के बारे में पहले भी लिखा (कैलकुलस के सन्दर्भ में). एक अखबार नें लेख के साथ आर्यभट की छवि भी छाप दी. जैसा की आजकल अक्सर होता है, यह छवि इन्टरनेट से आयी थी. हैरत की बात है कि इन्टरनेट पर आर्यभट की प्रमुख छवियाँ बिना एक शब्द कहे उसे पूरी तरह ब्राह्मण बताती हैं. उस अखबार ने जो छवि छापी वह विकिपीडिया से आयी थी. वह छवि आर्यभट की एक प्रतिमा की है जो पुणे के Inter-University Centre for Astronomy and Astrophysics (आयूका) में खडी है. इस प्रतिमा में आर्यभट को जनेऊ पहने हुए दिखाया गया है, जिससे स्पष्ट है कि प्रतिमाकार ने उसे ब्राह्मण माना और दर्शाया. विदेशी प्रतिमाकार ने यह साधारण बात नहीं समझी कि जनेऊ के साथ शिखा भी होनी चाहिए, और उसके फैले हुए बाल और हट्टा-कट्टा शरीर दिखाया जैसे यूनानी प्रतिमाओं में होता है.
जब यह प्रतिमा स्थापित की गयी, तब आयूका के जनसंपर्क अधिकारी नें मुझे इमेल कर पूछा था उस आर्या (श्लोक) के बारे में जिसमें आर्यभट ने पृथ्वी की तुलना कदम्ब के फूल से की. मैंने वह स्त्रोत तो बता दिया, लेकिन यह भी बता दिया की नाम आर्यभट है, आर्यभट्ट नहीं. साथ साथ यह भी कहा कि यह बात उसे अपने निदेशक जयंत नार्लीकर को भी बता देना चाहिए. जवाब आया कि नार्लीकर को यह बात मालूम है. मैंने आगे पूछा कि अगर ऐसा है तो नार्लीकर द्वारा लिखी गयी सरकारी स्कूली पुस्तकों में आर्यभट का नाम गलत क्यूं लिखा गया है? जवाब तो नहीं आया, लेकिन कुछ साल बाद आपत्ति जताने पर स्कूली पुस्तकों में आर्यभट का नाम सही कर दिया गया. जनेऊ वाली प्रतिमा तो पत्थर की है, और उसकी छवि विकिपीडिया में अभी भी है. इस तरह के "ज्ञान" में अंध विश्वास रखने वाले करोड़ों लोग आर्यभट को कई और सालों तक ब्राह्मण मानते जायेंगे. इसका इलाज मेरे पास नहीं है.
आर्यभट अनूठा जरूर था लेकिन वह अकेला दलित गणितज्ञ नहीं था. उसके पांच सौ साल बाद आर्यभट द्वितीय आता है. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि तब सदियों तक दलितों के हालात इतने खराब नहीं थे. बलकी जैसे माधव के शंकर दिगविजय में बताया गया है ब्राह्मणों के बुरे हाल थे इसके वस्तुगत कारण थे. बौद्ध धर्म और बाद में मुसलमान शासन के व्यापक होते हुए दलितों पर ज्यादा अत्याचार संभव नहीं था, क्योंकि अत्याचार से बचने के लिए धर्मान्तरण एक सरल उपाय था. यही सोच कर बाबासाहेब आम्बेडकर ने खुद धर्मान्तरण किया और बौद्ध बन गए. धर्मान्तरण पर इस समय चल रहे बवाल के बीच यह भी सोचना ज़रूरी है कि धर्मान्तरण दलितों के लिए अत्याचार से बचने की विधी भी है, जैसे कि बाबासाहेब आम्बेडकर नें खुद दर्शाया. इसलिए ऐसा कोई भी क़ानून जो धर्मान्तरण रोकता है दलित विरोधी होगा.
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सी. के. राजू IIT मंडी में मैथ में विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं, और हाल ही में "कैलकुलस का गणित" नाम से वहां एक डीकोलोनाइज्ड मैथ कोर्स पढ़ाया.